श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.13.127 
तथापि आमार मन हरे वृन्दावन ।
वृन्दावने उदय कराओ आपन - चरण ॥127॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि हम दोनों एक ही हैं, फिर भी मेरा मन वृन्दावन-धाम की ओर आकृष्ट है। मेरी कामना है कि आप पुनः अपने चरणकमलों के साथ वृन्दावन में प्रकट हों।
 
Although we are both here, my heart still yearns for Vrindavan. I wish that you would place your lotus feet in Vrindavan again.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd