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श्लोक 2.13.127  |
तथापि आमार मन हरे वृन्दावन ।
वृन्दावने उदय कराओ आपन - चरण ॥127॥ |
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| अनुवाद |
| यद्यपि हम दोनों एक ही हैं, फिर भी मेरा मन वृन्दावन-धाम की ओर आकृष्ट है। मेरी कामना है कि आप पुनः अपने चरणकमलों के साथ वृन्दावन में प्रकट हों। |
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| Although we are both here, my heart still yearns for Vrindavan. I wish that you would place your lotus feet in Vrindavan again. |
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