श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  2.13.122 
एइ श्लोक महाप्रभु पड़े बार बार ।
स्वरूप विना अर्थ केह ना जाने इहार ॥122॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस श्लोक का बार-बार पाठ किया। परन्तु स्वरूप दामोदर के कारण कोई भी इसका अर्थ नहीं समझ सका।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu was reciting this verse again and again, but no one except Swarupa Damodara could understand its meaning.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)