श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  2.13.109 
कभु नेत्रे नासाय जल, मुखे पड़े फेन ।
अमृतेर धारा चन्द्र - बिम्बे वहे येन ॥109॥
 
 
अनुवाद
उनकी आँखों से, कभी नासिका से, कभी जल बहता था, और उनके मुख से झाग गिरता था। ऐसा प्रतीत होता था मानो ये चन्द्रमा से अमृत की धाराएँ गिर रही हों।
 
Sometimes tears flowed from his eyes, sometimes from his nostrils. Foam fell from his mouth. It seemed as if streams of nectar were flowing from the moon.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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