श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  2.13.107 
कभु स्तम्भ, कभु प्रभु भूमिते लोटाय ।
शुष्क - काष्ठ - सम पद - हस्त ना चलय ॥107॥
 
 
अनुवाद
कभी वे अचेत से प्रतीत होते, तो कभी ज़मीन पर लोटते। कभी-कभी तो उनके पैर और हाथ सूखी लकड़ी की तरह सख्त हो जाते, और वे हिलते तक नहीं।
 
Sometimes he seemed paralyzed and sometimes he rolled on the ground. Sometimes his hands and feet became stiff as wood, making it impossible for him to move.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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