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श्लोक 2.12.9  |
ताँ - सबार प्रसादे मिले श्री - प्रभुर पाय ।
प्रभु - कृपा विना मोर राज्य नाहि भाय ॥9॥ |
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| अनुवाद |
| "सभी भक्तों की कृपा से ही भगवान के चरणकमलों की शरण प्राप्त होती है। उनकी कृपा के बिना मेरा राज्य मुझे प्रिय नहीं है।" |
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| "Only by the grace of all devotees can one attain refuge at the feet of Mahaprabhu. Without Mahaprabhu's grace, I do not like my kingdom. |
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