श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 12: गुण्डिचा मन्दिर की सफाई  »  श्लोक 214
 
 
श्लोक  2.12.214 
श्री - मुख - सुन्दर - कान्ति बाढ़े क्षणे क्षणे ।
कोटि - भक्त - नेत्र - भृङ्ग करे मधु - पाने ॥214॥
 
 
अनुवाद
उनके सुन्दर मुख की चमक प्रतिक्षण बढ़ती जा रही थी और सैकड़ों-हजारों भक्तों की आँखें भौंरों की तरह उसका मधुपान कर रही थीं।
 
The radiance of his beautiful face was increasing every moment and the eyes of millions of devotees were drinking its honey like bees.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)