श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.11.8 
निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य पारं परं जिगमिषोर्भव - सागरस्य ।
सन्दर्शनं विषयिणामथ योषितां च हा हन्त हन्त विष - भक्षणतोऽप्यसाधु ॥8॥
 
 
अनुवाद
तब भगवान ने अत्यन्त शोक प्रकट करते हुए सार्वभौम भट्टाचार्य को बताया, "अफसोस, जो व्यक्ति गंभीरतापूर्वक भवसागर को पार करने तथा भौतिक उद्देश्यों के बिना भगवान की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न होने की इच्छा रखता है, उसके लिए किसी भौतिकवादी को इन्द्रियतृप्ति में लिप्त देखना या उसी प्रकार की रुचि रखने वाली स्त्री को देखना, स्वेच्छा से विष पीने से भी अधिक घृणित है।"
 
Expressing great sorrow, Mahaprabhu told Sarvabhauma Bhattacharya, “Alas! For one who wishes to cross the ocean of existence and engage in the transcendental loving service of the Lord without any material motive, to look at a materialist engaged in sense gratification or a woman having such interests is more condemnable than deliberately consuming poison.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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