आमि - छार, योग्य नहि ताँर दरशने ।
ताँरे येइ भजे ताँर सफल जीवने ॥23॥
अनुवाद
तब महाराज प्रतापरुद्र ने बड़ी विनम्रता से कहा, 'मैं अत्यंत पतित और निंदनीय हूँ, और भगवान का साक्षात्कार करने के योग्य नहीं हूँ। यदि कोई उनकी सेवा में लगे, तो उसका जीवन सफल हो जाता है।'
"Then Maharaja Prataparudra humbly said, 'I am extremely fallen and despised. I am unworthy to have the darshan of the Supreme Lord. The life of one who devotes himself to His service becomes successful.'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥