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श्लोक 2.11.167  |
जगन्नाथ - सेवकेर मोर स्पर्श नाहि हय ।
ताहाँ प ड़ि’ रहों, - मोर एइ वाञ्छा हय ॥167॥ |
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| अनुवाद |
| "मैं नहीं चाहती कि भगवान जगन्नाथ के सेवक मुझे छूएँ। मैं वहाँ बगीचे में अकेली रहूँगी। यही मेरी इच्छा है।" |
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| "I don't want Lord Jagannatha's servants to touch me. I will stay alone there in the garden. That is my wish." |
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