श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 167
 
 
श्लोक  2.11.167 
जगन्नाथ - सेवकेर मोर स्पर्श नाहि हय ।
ताहाँ प ड़ि’ रहों, - मोर एइ वाञ्छा हय ॥167॥
 
 
अनुवाद
"मैं नहीं चाहती कि भगवान जगन्नाथ के सेवक मुझे छूएँ। मैं वहाँ बगीचे में अकेली रहूँगी। यही मेरी इच्छा है।"
 
"I don't want Lord Jagannatha's servants to touch me. I will stay alone there in the garden. That is my wish."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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