श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  2.11.157 
प्रभु कहे, - मुरारि, कर दैन्य संवरण ।
तोमार दैन्य देखि’ मोर विदीर्ण हय मन ॥157॥
 
 
अनुवाद
भगवान बोले, "मेरे प्यारे मुरारी, कृपया अपनी अनावश्यक विनम्रता पर लगाम लगाएँ। आपकी विनम्रता देखकर मेरा मन व्याकुल हो रहा है।"
 
Mahaprabhu said, "O Murari, please stop your unnecessary humility. Seeing your humility, my mind is disturbed."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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