श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 11: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेड़ा-कीर्तन लीलाएँ  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  2.11.112 
भट्ट कहे , - तुमि येइ कह, सेइ विधि - धर्म ।
एइ राग - मार्गे आछे सूक्ष्म - धर्म - मर्म ॥112॥
 
 
अनुवाद
भट्टाचार्य ने राजा से कहा, "आपने जो कहा है वह तीर्थों के दर्शन के नियमों के अनुसार सही है, लेकिन एक और मार्ग भी है, वह है सहज प्रेम का मार्ग। उन सिद्धांतों के अनुसार, धार्मिक सिद्धांतों के पालन में सूक्ष्म जटिलताएँ निहित हैं।"
 
Bhattacharya said to the king, "What you have said is correct according to the rules of visiting holy places, but there is another way, the path of spontaneous passionate love. According to this, the observance of religious rules involves subtle nuances."
तात्पर्य
वैदिक नियमों के अनुसार, किसी भी पवित्र तीर्थ स्थान में प्रवेश करने से पहले मनुष्य का ब्रह्‍मचर्य होना चाहिए। आम तौर पर लोग भोग विलास के आदी होते हैं और रात में शारीरिक संबंध बनाए बिना सो नहीं पाते। इस तरह के नियम मानते हैं कि साधारण मनुष्‍यों को पवित्र तीर्थ स्थानों पर जाने से पहले संपूर्ण ब्रह्‍मचर्य का पालन करना चाहिए। जैसे ही कोई मनुष्‍य पवित्र स्थान पर प्रवेश करता है, उसे दिनभर उपवास करना होगा। इसके बाद सिर को साफ करना होगा और इसके बाद आसपास के किसी नदी या महासागर में स्‍नान करना होगा। पाप कर्मों का प्रभाव खत्‍म करने के लिए ये उपाय अपनाए जाते हैं। पवित्र तीर्थ स्‍थान का दौरा करने का अर्थ है अपने पापमय जीवन की प्रतिक्रिया को निष्‍प्रभावी करना। जो पवित्र तीर्थ स्‍थलों में जाते हैं, वे वास्‍तव में अपने पापमय जीवन की प्रतिक्रिया से मुक्‍ति पाते हैं और इसलिए पवित्र तीर्थ स्‍थलों में उन पापमय कर्मों का बोझ होता है जिन्‍हें दौरा करने वाले वहां छोड़ जाते हैं।

जब कोई संत या पवित्र भक्‍त ऐसे पवित्र स्‍थान पर जाते हैं तो वे साधारण मनुष्‍यों द्वारा छोड़े गए पापों को सोख लेते हैं और इसे फिर से पवित्र करते हैं। तीर्थी-कुर्वन्ति तीर्थानि (भाग.1.13.10)। इसलिए पवित्र स्‍थलों पर आम मनुष्‍यों और उन्‍नत संतों का जाना अलग-अलग होता है। साधारण मनुष्‍य पवित्र स्‍थलों में अपने पापों को छोड़ जाते हैं और संत या भक्‍त अपनी उपस्थिति से इन पापों को दूर करते हैं। प्रभु चैतन्य महाप्रभु के भक्‍त साधारण मनुष्‍य नहीं थे और वे पवित्र स्‍थानों पर जाने को लेकर बनाए गए नियमों और विनियमों से नहीं बंधे थे। इसके बजाय उन्‍होंने प्रभु चैतन्य महाप्रभु के प्रति अपने अनायास प्रेम का प्रदर्शन किया। पवित्र स्‍थान पर पहुंचने के तुरंत बाद ही वे महाप्रभु से मिलने गए और उन्‍होंने उनके आदेशानुसार पवित्र स्‍थलों के नियमों का पालन किए बिना महा प्रसाद ग्रहण किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)