श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.1.87 
राधिका - उन्माद यैछे उद्धव - दर्शने ।
उद्भूर्णा - प्रलाप तैछे प्रभुर रात्रि - दिने ॥87॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार श्रीमती राधारानी उद्धव की उपस्थिति में भौंरे से असंगत बातें करती थीं, उसी प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु भी अपने परमानंद में दिन-रात पागलपन और असंगत बातें करते रहते थे।
 
Just as Srimati Radharani babbled incoherently like a bee in the presence of Uddhava, Sri Chaitanya Mahaprabhu spoke incoherently day and night like a madman in a state of emotional rage.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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