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श्लोक 2.1.51  |
शेष आर येइ रहे द्वादश वत्सर ।
कृष्णेर विरह - लीला प्रभुर अन्तर ॥51॥ |
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| अनुवाद |
| अंतिम बारह वर्ष भगवान के हृदय में विरहपूर्वक कृष्ण की लीलाओं का आनन्द लेने में ही व्यतीत हुए। |
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| Mahaprabhu spent his last twelve years simply enjoying the love of Krishna's separation within his heart. |
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