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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.1.43 
श्री - भागवत - सन्दर्भ - नाम ग्रन्थ - विस्तार ।
भक्ति - सिद्धान्तेर ताते देखाइयाछेन पार ॥43॥
 
 
अनुवाद
श्री भागवत-सन्दर्भ में श्रील जीव गोस्वामी ने भक्ति सेवा के अंतिम लक्ष्य के बारे में निर्णायक रूप से लिखा है।
 
Srila Jiva Goswami has described in detail the ultimate culmination of devotion in Sri Bhagavatam.
तात्पर्य
भगवत्सन्दर्भ को षट्-सन्दर्भ के नाम से भी जाना जाता है। प्रथम भाग, तत्त्व-सन्दर्भ, में यह सिद्ध किया गया है कि श्रीमद्भगवतम सबसे आधिकारिक प्रमाण है जो सीधे परम सत्य की ओर संकेत करता है। दूसरा सन्दर्भ, भगवत्सन्दर्भ, निराकार ब्रह्म और स्थानीकृत परमात्मा के बीच अंतर बताता है और आध्यात्मिक जगत् और सद्गुण की प्रभुता का वर्णन करता है जो अन्य दो भौतिक प्रकृति से दूषित नहीं है। दूसरे शब्दों में, शुद्ध-सत्त्व के रूप में जानी जाने वाली पारलौकिक स्थिति का विशद वर्णन है। भौतिक सद्गुण अन्य दो भौतिक गुणों - अज्ञान और कामना - से दूषित होने के लिए प्रवृत्त होता है - लेकिन जब व्यक्ति शुद्ध-सत्त्व की स्थिति में होता है, तो ऐसे दूषण का कोई अवसर नहीं होता। यह शुद्ध सद्गुण का आध्यात्मिक मंच है। परम भगवान और जीव की शक्ति का भी वर्णन किया गया है, और भगवान की अकल्पनीय ऊर्जाओं और ऊर्जाओं की किस्मों का वर्णन है। शक्तियों को श्रेणियों में विभाजित किया गया है - आंतरिक, बाहरी, व्यक्तिगत, सीमांत और इसी तरह। मूर्ति पूजा की शाश्वतता, मूर्ति की सर्वशक्तिमानता, उसकी सर्वव्यापकता, सबको आश्रय देने, उसकी सूक्ष्म और स्थूल शक्तियों, उसकी व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों, रूप, गुण और लीलाओं की अभिव्यक्तियों, उसकी पारलौकिक स्थिति और उसके पूर्ण रूप की भी चर्चाएं हैं। यह भी कहा गया है कि परम से संबंधित हर चीज में समान शक्ति होती है और आध्यात्मिक जगत, आध्यात्मिक जगत में सहयोगी और आध्यात्मिक जगत में भगवान की त्रिगुणात्मक ऊर्जाएँ सभी पारलौकिक हैं। निराकार ब्रह्म और भगवान के व्यक्तित्व, भगवान के व्यक्तित्व की पूर्णता, वैदिक ज्ञान के उद्देश्य, भगवान की व्यक्तिगत शक्तियों और वैदिक ज्ञान के मूल लेखक के रूप में भगवान के व्यक्तित्व के बीच के अंतर के बारे में आगे चर्चाएं होती हैं।

तीसरे सन्दर्भ को परमात्मा-सन्दर्भ कहा जाता है और इस पुस्तक में परमात्मा (परमात्मा) का वर्णन है और लाखों-लाखों जीवों में परमात्मा के अस्तित्व की व्याख्या है। गुणात्मक अवतारों और जीवों, माया, भौतिक जगत, परिवर्तन के सिद्धांत, भ्रम ऊर्जा, इस जगत और परमात्मा की समानता और इस भौतिक जगत के सत्य के बारे में मतभेदों की चर्चा है। इस संबंध में, श्रीधर स्वामी के विचार दिए गए हैं। यह कहा गया है कि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, भले ही भौतिक गुणों से रहित हो, सभी भौतिक गतिविधियों का निरीक्षण करता है। लीला अवतार अवतार भक्तों की इच्छाओं का कैसे जवाब देते हैं और भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व किस प्रकार छह ऐश्वर्यों की विशेषता है, इस पर भी चर्चा है।

चौथे सन्दर्भ को कृष्ण-सन्दर्भ कहा जाता है और इस पुस्तक में कृष्ण को भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व सिद्ध किया गया है। कृष्ण के लीलाओं और गुणों, पुरुष अवतारों के उनके निरीक्षण आदि पर चर्चाएं हैं। श्रीधर स्वामी की राय की पुष्टि की गई है। प्रत्येक शास्त्र में, कृष्ण के वर्चस्व पर बल दिया जाता है। बलदेव, संकर्षण और कृष्ण के अन्य विस्तार महा-संकर्षण के प्रवाह हैं। सभी अवतार और विस्तार कृष्ण के शरीर में एक साथ मौजूद हैं, जिन्हें दो हाथ वाला बताया गया है। गोलोक ग्रह, वृंदावन (कृष्ण का शाश्वत स्थान), गोलोक और वृंदावन की पहचान, यादवों और ग्वालों (दोनों कृष्ण के शाश्वत सहयोगी), प्रकट और अप्रकट लीलाओं की समानता, गोकुल में श्री कृष्ण की अभिव्यक्ति के बारे में विवरण भी हैं। आंतरिक शक्ति के विस्तार के रूप में द्वारका की रानियां और उनसे श्रेष्ठ, अत्युत्तम गोपियाँ। गोपियों के नामों की सूची और श्रीमती राधारानी की सर्वोच्च स्थिति पर भी चर्चा है।

पाँचवाँ संदर्भ ग्रन्थ भक्ति-संदर्भ कहलाता है और इस पुस्तक में इस बात की व्याख्या है कि भक्ति पूर्ण रूप से कैसे की जा सकती है और इस प्रकार की सेवा का कैसे समायोजन किया जा सकता है, पूर्ण या अप्रत्यक्ष रूप से। सभी प्रकार के शास्त्रों के ज्ञान, वर्णाश्रम के वैदिक संस्था की स्थापना, कर्म के अनुसार फल की अपेक्षा भक्ति श्रेष्ठ है और इस प्रकार के कई अन्य मुद्दों की भी व्याख्या है। यहाँ यह भी कहा गया है कि भक्ति सेवा के बिना ब्राह्मण भी निंदित होता है। कर्म त्याग प्रक्रिया (कर्म के परिणामों को परम भगवान को समर्पित करना) और रहस्यमय योग व दार्शनिक विचारों के बारे में व्याख्या की गई है, जिन्हें केवल कठोर श्रम बताया गया है। देवी-देवताओं की पूजा को हतोत्साहित किया गया है और वैष्णव की पूजा श्रेष्ठ मानी गई है। गैर-भक्तों को कोई सम्मान नहीं दिया गया है। जीवन में कैसे मुक्त हुआ जा सकता है (जीवन-मुक्त) के विषय में व्याख्या की गई है, भगवान शिव एक भक्त हैं और कैसे एक भक्त और उसकी भक्ति सेवा शाश्वत रूप से विद्यमान है। यह कहा गया है कि भक्ति के द्वारा सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि भक्ति भौतिक गुणों से परे है। इस बात की व्याख्या है कि कैसे भक्ति के द्वारा स्व की अभिव्यक्ति होती है। स्वयं के सुख के बारे में भी व्याख्या की गई है। यहाँ तक कि अपूर्ण रूप से की गई भक्ति भी भगवान के चरणों को पाने में सक्षम करती है। निःस्वार्थ भक्ति सेवा की बहुत सराहना की गई है और यह भी समझाया गया है कि कैसे भक्तजन अन्य भक्तों के साथ मिलकर निःस्वार्थ सेवा के स्तर को प्राप्त कर सकते हैं। महा-भागवत और साधारण भक्तों के बीच अंतर, दार्शनिक विचार-विमर्श, स्वयं की पूजा या अहंग्रह उपासना, भक्ति सेवा के लक्षण, काल्पनिक पूर्णता के लक्षण, विनियामक सिद्धांतों को स्वीकार करना, गुरु सेवा, महा-भागवत (मुक्त भक्त) और उसकी सेवा, वैष्णवों की सेवा, भगवान के चरणों को सुनना, जप करना, उनका स्मरण करना और उनकी सेवा करना, पूजा में दोष, आक्रामक प्रभाव, प्रार्थना, भगवान के अनंत सेवक के रूप में स्वयं को नियुक्त करना, भगवान से दोस्ती करना और उनकी प्रसन्नता के लिए सब कुछ समर्पित करना। इसके साथ ही रागानुगा भक्ति (भगवान के सहज प्रेम), भगवान कृष्ण के भक्त बनने के विशेष उद्देश्य और अन्य पूर्णतावादी अवस्थाओं के एक तुलनात्मक अध्ययन पर भी व्याख्या की गई है।

छठा संदर्भ प्रीति संदर्भ कहलाता है जो भगवद् प्रेम पर एक सिद्धांत है। यहाँ यह कहा गया है कि भगवद् प्रेम से व्यक्ति पूर्ण रूप से मुक्त हो जाता है और जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त करता है। एक व्यक्तिवादी की मुक्त अवस्था और एक अवैयक्तिकवादी की मुक्त अवस्था के बीच एक अंतर किया गया है, और जीवनकाल के दौरान मुक्ति पर एक चर्चा है जिसे भौतिक बंधन से मुक्ति से अलग दर्शाया गया है। सभी प्रकार की मुक्ति में से, भगवान की प्रेममय सेवा में मुक्ति को सर्वोच्च बताया गया है, और परम भगवान से आमने-सामने मिलना जीवन की सर्वोच्च पूर्णता के रूप में दर्शाया गया है। तत्काल मुक्ति की तुलना क्रमिक प्रक्रिया द्वारा मुक्ति से की गई है। ब्रह्म का अहसास और परम भगवान से मिलना दोनों को जीवनकाल के भीतर मुक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, लेकिन परम भगवान से मिलना, आंतरिक और बाह्य दोनों रूप से, ब्रह्म तेज की पारलौकिक उपलब्धि से ऊपर सर्वोत्कृष्ट दर्शाया गया है। सालोक्य, सामीप्य और सारूप्य के रूप में मुक्ति का तुलनात्मक अध्ययन है। समीप्य सालोक्य से बेहतर है। भक्ति सेवा को अधिक सुविधाओं के साथ मुक्ति माना जाता है, और इस पर चर्चा है कि इसे कैसे प्राप्त किया जाए। पारलौकिक अवस्था पर भी चर्चाएँ हैं जो भक्ति पटल को प्राप्त करने के बाद प्राप्त होती है, जो भगवद् प्रेम की सटीक स्थिति है; पारलौकिक प्रेम के सीमांत लक्षण, और यह कैसे जागृत होता है; भगवद् प्रेम के मंच पर तथाकथित प्रेम और पारलौकिक प्रेम के बीच का अंतर; और विभिन्न प्रकार के हास्य और भाव जो गोपियों के कामुक मामलों को पसंद करने में आनंदित होते हैं, जो सांसारिक मामलों से अलग हैं, जो बदले में कृष्ण के लिए शुद्ध प्रेम का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व हैं। दार्शनिक अटकलों से मिश्रित भक्ति पर भी चर्चाएँ हैं, गोपियों के प्रेम की श्रेष्ठता, वैभवशाली भक्ति सेवा और प्रेममय भक्ति सेवा के बीच का अंतर, गोकुल के निवासियों की उन्नत स्थिति, कृष्ण के दोस्तों की उत्तरोत्तर उन्नत स्थिति, पालन-पोषण में गोप और गोपियाँ कृष्ण के साथ प्यार करते हैं, और अंत में गोपियों के प्रेम और श्रीमती राधारानी की श्रेष्ठता। इस बात पर भी चर्चा है कि जब कोई व्यक्ति उनका अनुकरण मात्र करता है तो आध्यात्मिक भावनाएँ कैसे उपस्थित हो सकती हैं और कैसे ऐसे भाव सांसारिक प्रेम के सामान्य भावों से बहुत श्रेष्ठ हैं, और विभिन्न परमानंदों, परमानंद के जागरण, पारलौकिक गुणों, धीर के भेद का वर्णन है। दत्त, वैवाहिक प्रेम का अत्यधिक आकर्षण, परमानंदित विशेषताएं, स्थायी परमानंदित विशेषताएं, भाव प्रत्यक्ष प्रेम सेवा की पाँच पारलौकिक विशेषताओं में विभाजित हैं, और अप्रत्यक्ष प्रेम सेवा, जिसे सात प्रभागों में माना जाता है। अंत में विभिन्न रसों के अतिव्यापन पर एक चर्चा है, और शांता (तटस्थता), सेवाभाव, आश्रय लेना, माता-पिता का प्यार, वैवाहिक प्रेम, प्रत्यक्ष पारलौकिक आनंद और अलगाव में आनंद, पिछला आकर्षण और श्रीमती राधारानी की महिमा पर चर्चाएँ हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)