श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.1.42 
ताँर भ्रातुष्पुत्र नाम - श्री - जीव - गोसाञि ।
यत भक्ति - ग्रन्थ कैल, तार अन्त नाइ ॥42॥
 
 
अनुवाद
श्री रूप गोस्वामी के भतीजे श्रील जीव गोस्वामी ने भक्ति पर इतनी पुस्तकें संकलित की हैं कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती।
 
Srila Jiva Goswami, nephew of Sri Rupa Goswami, has written so many books on devotion that they cannot be counted.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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