श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.1.34 
प्रभु आज्ञाय कैल सब शास्त्रेर विचार ।
व्रजेर निगूढ़ भक्ति करिल प्रचार ॥34॥
 
 
अनुवाद
गोस्वामीगण ने समस्त गोपनीय वैदिक साहित्य के विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर भक्ति का प्रचार कार्य किया। यह श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार था। इस प्रकार वृन्दावन की परम गोपनीय भक्ति को समझा जा सकता है।
 
These Goswamis propagated devotion based on an analytical study of all the esoteric Vedic literature. This was in fulfillment of Sri Chaitanya Mahaprabhu's command. Thus, one can understand the most profound devotion of Vrindavan.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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