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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 284
 
 
श्लोक  2.1.284 
ताँर आज्ञा ल ञा गेला प्रभुर चरणे ।
प्रभु ताँरे समर्पिला स्वरूपेर स्थाने ॥284॥
 
 
अनुवाद
बाद में, श्रील रघुनाथदास गोस्वामी ने घर त्याग दिया और जगन्नाथपुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण ली। उस समय, भगवान ने उनका स्वागत किया और उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के लिए स्वरूप दामोदर की देखरेख में रखा।
 
Later, Srila Raghunatha Dasa Goswami left his home and took refuge with Sri Chaitanya Mahaprabhu in Jagannatha Puri. At that time, Mahaprabhu accepted him and entrusted him to the care of Svarupa Damodara for spiritual advancement.
तात्पर्य
इस संबंध में, श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी विलाप-कुसुमांजली (5) में लिखते हैं:

यो माँ दुस्तर-गेह-निर्जल-महा-कूपाद् अपार-क्लमात्

 सद्यः सांद्र-दयाम्बुधिः प्रकृतीतः स्वैरीकृपा-रज्जुभिः

उद्धृत्यत्म-सरोज-निंडि-चरण-प्रान्तं प्रपद्य स्वयं

 श्री-दामोदर-साच-चकार तमहं चैतन्य-चंद्रं भजे

"मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के कमल चरणों में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ, जिन्होंने अपनी अपार कृपा से, मुझे पारिवारिक जीवन से, जो पानी के बिना एक अंधे कुएँ की तरह है, बचाया और मुझे स्वरूप दामोदर गोस्वामी की देखभाल में आनंद के पारलौकिक सागर में रखा।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)