श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 247
 
 
श्लोक  2.1.247 
आनन्दे भक्त - सङ्गे सदा कीर्तन - विलास ।
जगन्नाथ - दरशन, प्रेमेर विलास ॥247॥
 
 
अनुवाद
जगन्नाथ पुरी में रहते हुए भगवान ने संकीर्तन करके और परमानंद में जगन्नाथ मंदिर में जाकर अपना समय बड़े आनंद से बिताया।
 
While staying in Jagannath Puri, Mahaprabhu happily spent his time in doing Sankirtan and visiting the Jagannath Temple with great devotion.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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