श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 156
 
 
श्लोक  2.1.156 
कुलिया नगर हैते पथ रत्ने बान्धाइल ।
निवृन्त पुष्प - शय्या उपरे पातिल ॥156॥
 
 
अनुवाद
सबसे पहले नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी ने कुलिया नगरी से शुरू होने वाले एक चौड़े मार्ग का विचार किया। उन्होंने मार्ग को रत्नों से सुसज्जित किया और फिर उस पर बिना डंठल वाले फूलों की क्यारी बिछा दी।
 
First, Nrisimhananda Brahmachari envisioned a wide road starting from Kuliya Nagari. He then decorated this road with gems and spread a bed of stemless flowers on it.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd