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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  2.1.122 
अनवसरे जगन्नाथेर ना पाञा दरशन ।
विरहे आलालनाथ करिला गमन ॥122॥
 
 
अनुवाद
जब जगन्नाथ मंदिर में अनुपस्थित थे, तो चैतन्य महाप्रभु, जो उन्हें देख नहीं सके, ने वियोग अनुभव किया और जगन्नाथ पुरी को छोड़कर आलनाथ नामक स्थान पर चले गए।
 
When Jagannatha was not in the temple, Sri Chaitanya Mahaprabhu could not see him. Consequently, yearning for him, he left Jagannatha Puri and went to a place called Alalnath.
तात्पर्य
आळलानाथ को ब्रह्मगिरी के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान जगन्नाथ पुरी से लगभग चौदह मील दूर है और समुद्र तट पर भी है। वहां एक जगन्नाथ मंदिर है। वर्तमान में एक पुलिस स्टेशन और डाकघर भी वहां स्थित हैं क्योंकि बहुत से लोग मंदिर को देखने आते हैं।

अनवसर शब्द का प्रयोग तब किया जाता है जब मंदिर में श्री जगन्नाथ जी को नहीं देखा जा सकता है। स्नान समारोह (स्नान-यात्रा) के बाद, भगवान जगन्नाथ स्पष्ट रूप से बीमार हो जाते हैं। इसलिए उन्हें उनके निजी अपार्टमेंट में ले जाया जाता है, जहाँ कोई भी उन्हें नहीं देख सकता है। दरअसल, इस दौरान जगन्नाथ भगवान की देह पर नवीनीकरण किया जाता है। इसे नव-यौवन कहा जाता है। रथ-यात्रा समारोह के दौरान, भगवान जगन्नाथ एक बार फिर जनता के सामने आते हैं। इस प्रकार स्नान समारोह के बाद पंद्रह दिनों तक भगवान जगन्नाथ किसी भी आगंतुक को दिखाई नहीं देते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)