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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  2.1.117 
ताहाञि करिल कूर्म - पुराण श्रवण ।
माया - सीता निलेक रावण, ताहाते लिखन ॥117॥
 
 
अनुवाद
रामेश्वर में, श्री चैतन्य महाप्रभु को कूर्म पुराण पढ़ने का मौका मिला, जिसमें उन्होंने पाया कि रावण द्वारा अपहरण की गई सीता का रूप वास्तविक सीता का नहीं था, बल्कि केवल छाया चित्रण था।
 
In Rameshwar, Sri Chaitanya Mahaprabhu had the opportunity to read the Kurma Purana, from which he came to know that the Sita whom Ravana had abducted was not the real Sita, but only her shadow.
तात्पर्य
कूर्म पुराण कहता है कि यह छाया सीता, पवित्रता की परीक्षा के रूप में, अग्नि में डाली गई थी। माया-सीता ही थी, जो अग्नि में प्रविष्ट हुई और वास्तविक सीता ही, वह थी जो अग्नि से बाहर आई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)