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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  1.9.53 
ये ये पूर्वे निन्दा कैल, बलि’ मातोयाल ।
सेहो फल खाय, नाचे, बले - भाल भाल ॥53॥
 
 
अनुवाद
जिन लोगों ने पहले भगवान चैतन्य महाप्रभु की आलोचना की थी और उन्हें शराबी कहा था, उन्होंने भी फल खाया और नाचते हुए कहने लगे, "बहुत अच्छा! बहुत अच्छा!"
 
Those who had earlier criticized Sri Chaitanya Mahaprabhu by calling him a drunkard also ate the fruit and started dancing, saying, “Very good! Very good!”
तात्पर्य
जब भगवान चैतन्य महाप्रभु ने संकीर्तन आन्दोलन शुरू किया तो उनकी भी मायावादियों, नास्तिकों और मूर्खों द्वारा अनावश्यक आलोचना की गई। स्वाभाविक रूप से हमारी भी ऐसे लोगों द्वारा आलोचना की जाती है। वे हमेशा रहेंगे और जो कुछ भी मानव समाज के लिए वास्तव में अच्छा है उसकी हमेशा आलोचना करेंगे। लेकिन संकीर्तन आंदोलन के प्रचारकों को ऐसी आलोचना से विचलित नहीं होना चाहिए। हमारी पद्धति ऐसे मूर्खों को धीरे-धीरे परिवर्तित करने की होनी चाहिए और उन्हें prasadam लेने, और हमारे साथ जप और नृत्य करने के लिए आमंत्रित करना चाहिए। यही हमारी नीति होनी चाहिए। जो कोई भी हमसे जुड़ता है, निःसंदेह उसे जीवन में आध्यात्मिक उन्नति के प्रति ईमानदार और गंभीर होना चाहिए; फिर ऐसा व्यक्ति, केवल हमसे जुड़कर, हमारे साथ जप करके, हमारे साथ नृत्य करके और हमारे साथ prasadam ग्रहण करके, धीरे-धीरे यह भी कहेगा कि यह आंदोलन बहुत अच्छा है। लेकिन जो व्यक्ति किसी अन्य उद्देश्य से, भौतिक लाभ या व्यक्तिगत संतुष्टि प्राप्त करने के लिए जुड़ता है, वह कभी भी इस आंदोलन के दर्शन को समझ नहीं पाएगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)