एसब - प्रसादे लिखि चैतन्य - लीला - गुण ।
जानि वा ना जानि, करि आपन - शोधन ॥5॥
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अनुवाद
इन सभी वैष्णवों और गुरुओं की कृपा से ही मैं भगवान चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं और गुणों के बारे में लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। चाहे मुझे पता हो या न हो, आत्म-शुद्धि के लिए ही मैं यह पुस्तक लिख रहा हूँ।
It is through the grace of all these Vaishnavas and gurus that I am attempting to write about the pastimes and qualities of Sri Chaitanya Mahaprabhu. Whether knowingly or unknowingly, I am writing this book for self-purification.
तात्पर्य
ओ तत्वज्ञान की रचनाओं का सारांश है। एक वैष्णव को अधिकृत, विनम्र और पवित्र होना चाहिए। अपनी ही स्व-शुद्धि के लिए तात्विक साहित्य रचनी चाहिए, नाम के लिए नहीं। भगवान की लीलाओं के विषय में लिखने से व्यक्ति सीधे उन भगवान के साथ जुड़ जाता हैं। व्यक्ति को भी यह महत्वाकांक्षी विचार नहीं करना चाहिए कि, "मैं एक महान लेखक बनूँगा। मैं एक लेखक के रूप में प्रसिद्ध हो जाऊंगा।" ये भौतिककामी इच्छाएं हैं। व्यक्ति को आत्म-शुद्धि के लिए लिखने का प्रयास करना चाहिए। वह प्रकाशित हो सकता है या नहीं भी हो सकता है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में लेखन में निष्ठावान है, तो उसकी सभी महत्वाकांक्षाएं पूरी होंगी। व्यक्ति को एक महान लेखक के रूप में जाना जाए या नहीं यह संयोगिक है। व्यक्ति को भौतिक नाम और प्रसिद्धि के लिए तात्विक साहित्य लिखने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥