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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  1.9.48 
येइ याहाँ ताहाँ दान करे प्रेम - फल ।
फलास्वादे मत्त लोक हइल सकल ॥48॥
 
 
अनुवाद
भगवान के प्रेम का फल इतना स्वादिष्ट होता है कि भक्त जहां भी इसे बांटता है, संसार में कहीं भी इसका स्वाद लेने वाले लोग तुरंत ही मदहोश हो जाते हैं।
 
The fruit of love of God is so delicious that wherever the devotee distributes it, anywhere in the world, whoever tastes this fruit becomes instantly intoxicated.
तात्पर्य
यहां भगवान् चैतन्य महाप्रभु द्वारा वितरित प्रेम के अद्भुद फल का वर्णन किया गया है। हमारे पास व्यावहारिक अनुभव है कि जो कोई भी इस फल को स्वीकार करता है और ईमानदारी से इसका स्वाद लेता है वह तुरंत इसके बाद पागल हो जाता है और चैतन्य महाप्रभु के उपहार, हरे कृष्ण महामंत्र के अनुसार अपनी सभी बुरी आदतों को छोड़ देता है। श्री चैतन्य-चरितामृत के कथन इतने व्यावहारिक हैं कि कोई भी उनका परीक्षण कर सकता है। जहां तक ​​हमारा सरोकार है, हम भगवान के प्रेम के महान फल के वितरण की सफलता के बारे में सबसे अधिक आश्वस्त हैं महामंत्र का जाप - हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे रामा, हरे रामा, रामा रामा, हरे हरे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)