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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  1.9.47 
एइ आज्ञा कैल यदि चैतन्य - मालाकार ।
परम आनन्द पाइल वृक्ष - परिवार ॥47॥
 
 
अनुवाद
वृक्ष के वंशज [श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्त] भगवान से सीधे यह आदेश पाकर बहुत प्रसन्न हुए।
 
The descendants of the tree (devotees of Sri Chaitanya Mahaprabhu) were very happy to receive this direct order from Mahaprabhu.
तात्पर्य
भगवान चैतन्य महाप्रभु की इच्छा है कि पाँच सौ वर्ष पूर्व नवद्वीप में आरंभ किये गए संकीर्तन आंदोलन के कल्‍याणप्रद कार्यो का विश्‍वव्‍यापी प्रचार होकर समस्‍त मानव जाति का कल्‍याण हो। दुर्भाग्‍य है कि चैतान्य महाप्रभु के बहुत से तथाकथित अनुयायी केवल एक मंदिर बनाने, देवताओं का पूजन-दर्शन कराने, थोड़े से पैसे इकट्‍ठा करने और उन्‍हें खाने-पीने और सोने में नष्‍ट करने से ही संतुष्‍ट रहते हैं। विश्‍वव्‍यापी रूप से श्री चैतन्य महाप्रभु के सिद्धांत का प्रचार करने की तो बात ही नहीं उठती। किंतु यद्यपि वे स्‍वयं ऐसा करने में असमर्थ हैं, यदि कोई दूसरा यह करता है, तो उन्‍हें उसका द्वेष हो जाता है। चैतन्य महाप्रभु के आधुनिक अनुयायियों की यह अवस्‍था है। कलियुग का प्रभाव इतना घोर है कि वह भगवान चैतन्य के तथाकथित अनुयायियों को भी प्रभावित कर रहा है। चैतन्य महाप्रभु के अनुयायियों को भारत से निकलकर विश्‍वव्‍यापी रूप से उनके सिद्धांत का प्रचार करना ही चाहिए, क्‍योंकि यही भगवान चैतन्य का मिशन है। भगवान चैतन्य के अनुयायियों को वृक्षों से भी अधिक सहिष्‍णु और सड़क के तिनकों से भी अधिक नम्र होकर उनके संकल्‍प को हृदय और आत्‍मा से पूरा करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)