अनिवार्य रूप से वृक्षों को बिना विचार किए काटना मानवीय दुर्व्यवहार का एक और उदाहरण है। कागज उद्योग अपने मिलों के लिए कई सैकड़ों और हजारों पेड़ों काटता है, और कागज के साथ इतना बेकार साहित्य मानव समाज की सनकी संतुष्टि के लिए प्रकाशित किया जाता है। दुर्भाग्य से, यद्यपि ये उद्योगपति अब अपने औद्योगिक विकास के कारण इस जीवन में खुश हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि पेड़ के रूप में रहने वाले जीवों को मारने का दायित्व उन्हें उठाना पड़ेगा।
श्रीमद्-भागवतम से उद्धृत यह श्लोक भगवान कृष्ण ने अपने दोस्तों से कहा था जब वह गोपियों के कपड़े चुराने के अपने मनोरंजन (वस्त्र-हरण-लीला) के बाद एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे। इस श्लोक को उद्धृत करते हुए, चैतन्य महाप्रभु हमें सिखाते हैं कि हमें पेड़ों की तरह सहनशील होना चाहिए और पेड़ों की तरह लाभकारी भी होना चाहिए, जो अपने नीचे आने वाले जरूरतमंद व्यक्तियों को सब कुछ देते हैं। एक ज़रूरतमंद व्यक्ति पेड़ों और कई जानवरों से भी कई लाभ उठा सकता है, लेकिन आधुनिक सभ्यता में लोग इतने कृतघ्न हो गए हैं कि वे पेड़ों और जानवरों का शोषण करते हैं और उन्हें मार देते हैं। ये आधुनिक सभ्यता की कुछ पापपूर्ण गतिविधियाँ हैं।
