Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.9.45 
माली ह ञा वृक्ष हइलाँ एइ त’ इच्छाते ।
सर्व - प्राणीर उपकार हय वृक्ष हैते ॥45॥
 
 
अनुवाद
“यद्यपि मैं माली का काम कर रहा हूँ, मैं वृक्ष भी बनना चाहता हूँ, क्योंकि इस प्रकार मैं सभी को लाभ पहुँचा सकता हूँ।
 
Although I am working as a gardener, I also want to become a tree, because in this way I can benefit everyone.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु मानव समाज में सबसे दयालु व्यक्ति हैं क्योंकि उनकी एकमात्र इच्छा लोगों को खुश करना है। उनका संकीर्तन आंदोलन विशेष रूप से लोगों को खुश करने के उद्देश्य से है। वह खुद पेड़ बनना चाहते थे क्योंकि एक पेड़ को सबसे दयालु जीवित प्राणी कहा जाता है। निम्नलिखित श्लोक में, जो श्रीमद-भागवतम (10.22.33) से है, स्वयं कृष्ण एक पेड़ के अस्तित्व की अत्यधिक प्रशंसा करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)