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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.9.44 
माली मनुष्य आमार नाहि राज्य - धन ।
फल - फुल दिया करि’ पुण्य उपार्जन ॥44॥
 
 
अनुवाद
"मैं तो बस एक माली हूँ। मेरे पास न तो कोई राज्य है और न ही बहुत ज़्यादा धन-संपत्ति। मेरे पास तो बस कुछ फल-फूल हैं जिनका उपयोग मैं अपने जीवन में धर्म-परायणता प्राप्त करने के लिए करना चाहता हूँ।"
 
I am merely a gardener. I have neither an empire nor vast wealth. I only have some fruits and flowers, which I want to use to attain virtue in my life.
तात्पर्य
मानव समाज के कल्याण हेतु कल्याणकारी गतिविधियों को संपन्न करने के लिए, श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं को अत्यंत धनी न होने के रूप में प्रस्तुत किया, यह संकेत देते हुए कि मानवता के कल्याण के लिए एक व्यक्ति को अत्यंत संपन्न या धनी होने की आवश्यकता नहीं है। कभी-कभी धनी लोग इस बात पर बहुत गर्व करते हैं कि वे मानव समाज के लिए लाभकारी कार्य कर सकते हैं जबकि अन्य नहीं कर सकते। एक व्यावहारिक उदाहरण यह है कि जब भारत में कम वर्षा के कारण खाद्य पदार्थों की कमी हो जाती है, तो धनी वर्ग के कुछ सदस्य सरकार की मदद से भव्य व्यवस्था करके खाद्य पदार्थों का वितरण करते हैं, मानो केवल ऐसी गतिविधियों से ही लोगों को लाभ होगा। मान लीजिए कि अनाज नहीं होता। धनी लोग भोजन का वितरण कैसे करेंगे? अनाज का उत्पादन पूरी तरह से भगवान् के हाथों में है। यदि बारिश नहीं होती, तो अनाज नहीं होगा, और ये तथाकथित धनी लोग लोगों को अनाज वितरित करने में असमर्थ होंगे।

इसलिए, जीवन का वास्तविक उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना है। श्रील रूप गोस्वामी ने अपने भक्ति-रसामृत-सिंधु में वर्णन किया है कि भक्ति सेवा इतनी उदात्त है कि यह प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभकारी और शुभ है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह भी घोषित किया कि मानव समाज में भक्ति सेवा के भक्ति पंथ का प्रचार करने के लिए, किसी को बहुत धनी होने की आवश्यकता नहीं है। जो कोई भी कला जानता है वह इसे कर सकता है और इस प्रकार मानवता को सर्वोच्च लाभ प्रदान कर सकता है। भगवान चैतन्य महाप्रभु एक माली की भूमिका लेते हैं क्योंकि एक माली स्वाभाविक रूप से बहुत धनी व्यक्ति नहीं होता है, लेकिन उसके पास कुछ फल और फूल होते हैं। कोई भी व्यक्ति कुछ फल और फूल एकत्र कर सकता है और भक्ति सेवा में भगवान को संतुष्ट कर सकता है, जैसा कि भगवान ने भगवद्-गीता (9.26) में अनुशंसा की है:

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति

तदहं भक्त्युपहृतं अश्नामि प्रयतात्मनः

कोई भी व्यक्ति अपने धन, संपत्ति या समृद्ध स्थिति से भगवान को संतुष्ट नहीं कर सकता, लेकिन कोई भी थोड़ा फल या फूल एकत्र कर सकता है और उन्हें भगवान को अर्पित कर सकता है। भगवान कहते हैं कि यदि कोई ऐसी भेंट भक्ति में लाता है, तो वह उसे स्वीकार करेंगे और उसे खाएंगे। भगवान के खाने से पूरा संसार तृप्त हो जाता है। महाभारत में एक कहानी है जो यह दर्शाती है कि भगवान के खाने से, दुर्वासा मुनि के साठ हजार शिष्य सभी कैसे संतुष्ट हो गए थे। इसलिए यह एक तथ्य है कि यदि हम अपने जीवन (प्राणैः) से, अपने धन (अर्थात्) से, अपनी बुद्धि (धीया) से या अपने शब्दों (वाचा) से भगवान को संतुष्ट कर सकते हैं, तो स्वाभाविक रूप से पूरा संसार सुखी हो जाएगा। इसलिए हमारा मुख्य कर्म अपने कार्यों, अपने धन और अपने शब्दों से भगवान को संतुष्ट करना है। यह बहुत ही सरल है। अगर किसी के पास पैसा भी नहीं है, तो भी वह हर किसी को हरे कृष्ण मंत्र का प्रचार कर सकता है। कोई भी, हर घर जा सकता है, और सभी से हरे कृष्ण मंत्र का जाप करने का अनुरोध कर सकता है। इस प्रकार पूरे विश्व की स्थिति बहुत ही सुखद और शांतिपूर्ण हो जाएगी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)