श्रीमद्-भागवतम के इस श्लोक में कहा गया है कि व्यक्ति को श्रेयस में रुचि होनी चाहिए। श्रेयस, या सौभाग्य के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, मनुष्य को अपने जीवन, धन और शब्दों सहित हर चीज को न केवल अपने बल्कि दूसरों के लिए भी लगाना चाहिए। हालाँकि, जब तक कोई अपने जीवन में श्रेयस में रुचि नहीं रखता, वह दूसरों के लाभ के लिए श्रेयस का उपदेश नहीं दे सकता।
श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा उद्धृत यह श्लोक मनुष्यों पर लागू होता है, न कि जानवरों पर। जैसा कि पिछले श्लोक में "मनुष्य-जन्म" शब्दों से संकेत मिलता है, ये नियम मनुष्यों के लिए हैं। दुर्भाग्य से, मनुष्य, हालाँकि उनके पास पुरुषों के शरीर हैं, लेकिन वे अपने व्यवहार में जानवरों से भी कम बनते जा रहे हैं। यह आधुनिक शिक्षा की गलती है। आधुनिक शिक्षक मानव जीवन का उद्देश्य नहीं जानते हैं; वे केवल इस बात से चिंतित हैं कि अपने देश या मानव समाज की आर्थिक स्थिति का विकास कैसे किया जाए। यह भी आवश्यक है; वैदिक सभ्यता मानव जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करती है, जिसमें धर्म (धर्म), अर्थ (आर्थिक विकास), काम (इंद्रिय तृप्ति) और मोक्ष (मुक्ति) शामिल हैं। लेकिन मानवता की पहली चिंता धर्म होनी चाहिए। धार्मिक होने के लिए, ईश्वर के आदेशों का पालन करना आवश्यक है, लेकिन दुर्भाग्य से इस युग के लोगों ने धर्म को अस्वीकार कर दिया है, और वे आर्थिक विकास में व्यस्त हैं। इसलिए वे पैसा पाने के लिए कोई भी रास्ता अपनाएंगे। आर्थिक विकास के लिए किसी को हुक या बदमाश द्वारा पैसे पाने की जरूरत नहीं है; उसे केवल अपने शरीर और आत्मा को बनाए रखने के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। हालाँकि, क्योंकि आधुनिक आर्थिक विकास बिना किसी धार्मिक पृष्ठभूमि के चल रहा है, इसलिए लोग धन के लिए वासनायुक्त, लालची और पागल हो गए हैं। वे केवल रजस (जुनून) और तमस (अज्ञान) के गुणों को विकसित कर रहे हैं, प्रकृति के दूसरे गुण, सत्व (भलाई) और ब्राह्मणवादी योग्यताओं की उपेक्षा कर रहे हैं। इसलिए पूरा समाज अराजकता में है।
भागवतम् कहता है कि एक उन्नत मनुष्य का कर्तव्य इस तरह से कार्य करना है जिससे मानव समाज को जीवन के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति में सुविधा हो। विष्णु पुराण के तीसरे भाग, बारहवें अध्याय, श्लोक 45 में एक समान श्लोक है, जिसे आगे चैतन्य-चरितामृत में उद्धृत किया गया है।
