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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  1.9.42 
एतावजन्म - साफल्यं देहिनामिह देहिषु ।
प्राणैरधिया वाचा श्रेय - आचरणं सदा ॥42॥
 
 
अनुवाद
'प्रत्येक प्राणी का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन, धन, बुद्धि और वचन से दूसरों के हित के लिए कल्याणकारी कार्य करे।'
 
“It is the duty of every living being to do welfare work for the benefit of others with his life, wealth, intelligence and speech.”
तात्पर्य
दो प्रकार की साधारण गतिविधियाँ होती हैं — श्रेयस, या वे क्रियाएँ जो अंततः लाभदायक और शुभ होती हैं, और प्रेयस, या वे जो तुरंत लाभदायक और शुभ होती हैं। उदाहरण के लिए, बच्चों को खेलने का शौक होता है। वे शिक्षा पाने के लिए स्कूल जाना नहीं चाहते, और उन्हें लगता है कि दिन-रात खेलना और अपने दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करना ही जीवन का उद्देश्य है। भगवान कृष्ण के पारलौकिक जीवन में भी, हम पाते हैं कि जब वे बच्चे थे तो उन्हें अपने हमउम्र दोस्तों, ग्वाल-बालों के साथ खेलना बहुत पसंद था। वे अपने घर भी खाना खाने नहीं जाते थे। माँ यशोदा को उन्हें घर आने के लिए मनाने के लिए बाहर आना पड़ता था। इस प्रकार बच्चों का स्वभाव दिन-रात खेलने में लगे रहना होता है, अपने स्वास्थ्य और अन्य महत्वपूर्ण चिंताओं की भी परवाह नहीं करते। यह प्रेयस, या तुरंत लाभदायक गतिविधियों का एक उदाहरण है। लेकिन श्रेयस, या वे गतिविधियाँ भी होती हैं जो अंततः शुभ होती हैं। वैदिक सभ्यता के अनुसार, एक इंसान को ईश्वर के प्रति जागरूक होना चाहिए। उसे समझना चाहिए कि ईश्वर क्या है, यह भौतिक दुनिया क्या है, वह कौन है, और उनके पारस्परिक संबंध क्या हैं। इसे श्रेयस, या अंततः शुभ कार्य कहा जाता है।

श्रीमद्-भागवतम के इस श्लोक में कहा गया है कि व्यक्ति को श्रेयस में रुचि होनी चाहिए। श्रेयस, या सौभाग्य के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, मनुष्य को अपने जीवन, धन और शब्दों सहित हर चीज को न केवल अपने बल्कि दूसरों के लिए भी लगाना चाहिए। हालाँकि, जब तक कोई अपने जीवन में श्रेयस में रुचि नहीं रखता, वह दूसरों के लाभ के लिए श्रेयस का उपदेश नहीं दे सकता।

श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा उद्धृत यह श्लोक मनुष्यों पर लागू होता है, न कि जानवरों पर। जैसा कि पिछले श्लोक में "मनुष्य-जन्म" शब्दों से संकेत मिलता है, ये नियम मनुष्यों के लिए हैं। दुर्भाग्य से, मनुष्य, हालाँकि उनके पास पुरुषों के शरीर हैं, लेकिन वे अपने व्यवहार में जानवरों से भी कम बनते जा रहे हैं। यह आधुनिक शिक्षा की गलती है। आधुनिक शिक्षक मानव जीवन का उद्देश्य नहीं जानते हैं; वे केवल इस बात से चिंतित हैं कि अपने देश या मानव समाज की आर्थिक स्थिति का विकास कैसे किया जाए। यह भी आवश्यक है; वैदिक सभ्यता मानव जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करती है, जिसमें धर्म (धर्म), अर्थ (आर्थिक विकास), काम (इंद्रिय तृप्ति) और मोक्ष (मुक्ति) शामिल हैं। लेकिन मानवता की पहली चिंता धर्म होनी चाहिए। धार्मिक होने के लिए, ईश्वर के आदेशों का पालन करना आवश्यक है, लेकिन दुर्भाग्य से इस युग के लोगों ने धर्म को अस्वीकार कर दिया है, और वे आर्थिक विकास में व्यस्त हैं। इसलिए वे पैसा पाने के लिए कोई भी रास्ता अपनाएंगे। आर्थिक विकास के लिए किसी को हुक या बदमाश द्वारा पैसे पाने की जरूरत नहीं है; उसे केवल अपने शरीर और आत्मा को बनाए रखने के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। हालाँकि, क्योंकि आधुनिक आर्थिक विकास बिना किसी धार्मिक पृष्ठभूमि के चल रहा है, इसलिए लोग धन के लिए वासनायुक्त, लालची और पागल हो गए हैं। वे केवल रजस (जुनून) और तमस (अज्ञान) के गुणों को विकसित कर रहे हैं, प्रकृति के दूसरे गुण, सत्व (भलाई) और ब्राह्मणवादी योग्यताओं की उपेक्षा कर रहे हैं। इसलिए पूरा समाज अराजकता में है।

भागवतम् कहता है कि एक उन्नत मनुष्य का कर्तव्य इस तरह से कार्य करना है जिससे मानव समाज को जीवन के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति में सुविधा हो। विष्णु पुराण के तीसरे भाग, बारहवें अध्याय, श्लोक 45 में एक समान श्लोक है, जिसे आगे चैतन्य-चरितामृत में उद्धृत किया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)