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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.9.41 
भारत - भूमिते हैल मनुष्य जन्म यार ।
जन्म सार्थक क रि’ कर पर - उपकार ॥41॥
 
 
अनुवाद
“जिसने भारत भूमि में मनुष्य के रूप में जन्म लिया है, उसे अपना जीवन सफल बनाना चाहिए और अन्य सभी लोगों के लाभ के लिए काम करना चाहिए।
 
“Whoever is born as a human being in Bharatbhoomi (Bharatvarsha) should make his life successful and work for the benefit of all other people.”
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने इस महत्वपूर्ण छंद में अपनी उदारता का परिचय दिया है। यद्यपि उनका जन्म बंगाल में हुआ था और इसलिए बंगालियों का उनके प्रति विशेष दायित्व है, श्री चैतन्य महाप्रभु केवल बंगालियों को ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतवासियों को संबोधित कर रहे थे। केवल भारत वर्ष में ही वास्तविक मानवीय सभ्यता विकसित हो सकती है।

मानव जीवन विशेष रूप से ईश्वर-साक्षात्कार के लिए है, जैसा कि वेदांत-सूत्र में कहा गया है: अथातो ब्रह्म जिज्ञासा। भारत वर्ष (भारत-वर्ष) की भूमि पर जन्म लेने वाला व्यक्ति भाग्यशाली होता है क्योंकि उसे वैदिक सभ्यता के उपदेश और मार्गदर्शन का लाभ उठाने का विशेष अवसर प्राप्त होता है। वह स्वतः ही आध्यात्मिक जीवन के बुनियादी सिद्धांतों को जान जाता है, क्योंकि 99.9% भारतीय, चाहे वे सादे ग्रामीण किसान हों या अन्य कोई, जो न तो शिक्षित हैं और न ही परिष्कृत हैं, आत्मा के पारगमन पर विश्वास करते हैं, पिछले और भविष्य के जन्मों पर विश्वास करते हैं, ईश्वर पर विश्वास करते हैं और स्वाभाविक रूप से भगवान या उनके प्रतिनिधि की पूजा करना चाहते हैं। ये विचार भारत में जन्मे व्यक्ति की स्वाभाविक विरासत हैं। भारत में गया, बनारस, मथुरा, प्रयाग, वृंदावन, हरिद्वार, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी जैसे अनेक पवित्र तीर्थ स्थान हैं और आज भी लोग वहाँ सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में जाते हैं। यद्यपि भारत के वर्तमान नेता लोगों को ईश्वर में विश्वास न करने, अगले जन्म में विश्वास न करने और धार्मिक और अधार्मिक जीवन के अंतर पर विश्वास न करने के लिए प्रभावित कर रहे हैं और यद्यपि वे उन्हें मदिरापान, मांसाहार और सभ्य बनने के लिए उकसा रहे हैं, फिर भी लोग पापपूर्ण जीवन की चार गतिविधियों - अवैध यौन संबंध, मांसाहार, नशा और जुआ खेलना - से डरते हैं और जब भी कोई धार्मिक उत्सव होता है, तो वे हज़ारों की संख्या में एकत्र होते हैं। हमारे पास इसका वास्तविक अनुभव है। जब भी कृष्ण चेतना आंदोलन कलकत्ता, बॉम्बे, मद्रास, अहमदाबाद या हैदराबाद जैसे बड़े शहर में संकीर्तन महोत्सव आयोजित करता है, तो हजारों लोग सुनने आते हैं। कभी-कभी हम अंग्रेजी में बोलते हैं, लेकिन अधिकांश लोग अंग्रेजी नहीं समझते, फिर भी वे हमारी बात सुनने आते हैं। ईश्वर के नकली अवतार भी जब बोलते हैं, तो लोग हज़ारों की संख्या में एकत्र होते हैं, क्योंकि भारत की भूमि पर जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रवृत्ति स्वाभाविक होती है और उसे आध्यात्मिक जीवन के बुनियादी सिद्धांत सिखाए जाते हैं; उन्हें केवल वैदिक सिद्धांतों में थोड़ी अधिक शिक्षा की आवश्यकता होती है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु यहाँ कहते हैं, जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार: यदि किसी भारतीय को वैदिक सिद्धांतों की शिक्षा दी जाती है, तो वह समूची दुनिया के लिए सबसे लाभकारी कल्याणकारी गतिविधि करने में सक्षम होता है।

वर्तमान में, कृष्ण चेतना, या ईश्वर चेतना की कमी के कारण, संपूर्ण दुनिया अंधकार में है, पापपूर्ण जीवन के चार सिद्धांतों - मांसाहार, अवैध यौन संबंध, जुआ और नशा - से आच्छादित है। इसलिए लोगों को पापपूर्ण गतिविधियों से दूर रहने के लिए शिक्षित करने के लिए सशक्त प्रचार की आवश्यकता है। इससे शांति और समृद्धि आएगी; बदमाशों, चोरों और व्यभिचारियों की संख्या स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगी और समूचा मानव समाज ईश्वर चेतन हो जाएगा।

हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन को पूरे विश्व में फैलाने की सफलता यह है कि अब सबसे अधम दुराचारी व्यक्ति सबसे श्रेष्ठ संत बन रहे हैं। यह विश्व के लिए केवल एक भारतीय की विनम्र सेवा है। यदि सभी भारतीय इस मार्ग पर चल पड़ते जैसा कि प्रभु चैतन्य महाप्रभु ने सलाह दी है तो भारत विश्व को एक अद्वितीय उपहार दे सकता था और इस तरह से भारत की महिमा होती। हालांकि, अब भारत को एक गरीबी से ग्रस्त देश के रूप में जाना जाता है और जब भी अमेरिका या किसी दूसरे समृद्ध देश से कोई भारत आता है तो वे कई लोगों को फुटपाथों पर भूखा सोते हुए देखते हैं जिनके पास एक दिन में दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता। ऐसे भी कई संस्थाएं हैं जो गरीबी से ग्रस्त लोगों के कल्याण के नाम पर दुनिया भर से पैसे इकट्ठा करती हैं लेकिन इसे अपनी भोग-विलासिता के लिए खर्च करती हैं। अब, श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश पर, कृष्ण चेतना आंदोलन की शुरुआत की गई है और लोग इस आंदोलन से लाभ प्राप्त कर रहे हैं। इसलिए अब यह भारत के नेताओं का कर्तव्य बनता है कि वे इस आंदोलन के महत्व को समझें और कई भारतीयों को इस मत का प्रचार करने के लिए भारत के बाहर भेजें। लोग इसे स्वीकार करेंगे, भारतीय लोगों और विश्व के अन्य लोगों में सहकार होगा और श्री चैतन्य महाप्रभु का मिशन सफल होगा। तब श्री चैतन्य महाप्रभु की महिमा पूरे विश्व में होगी और लोग स्वाभाविक रूप से खुशहाल, शांत और समृद्ध होंगे। न केवल इस जीवन में बल्कि अगले जन्म में भी। क्योंकि जैसे कि भगवद गीता में कहा गया है। कृष्ण, जो कि परमेश्वर व्यक्तित्व हैं, को समझने वाला व्यक्ति बहुत आसानी से जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति पा सकता है और वापस परमेश्वर के पास घर जा सकता है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु प्रत्येक भारतीय से उनके मत का प्रचारक बनकर विश्व को घोर भ्रम से बचाने का आग्रह करते हैं। यह केवल भारतीयों का ही कर्तव्य नहीं है बल्कि हर किसी का कर्तव्य है और हमें बहुत खुशी है कि अमेरिकी और यूरोपीय लड़के और लड़कियां इस आंदोलन में बहुत गंभीरता से सहयोग कर रहे हैं। निश्चित रूप से, सभी मानव समाज के लिए सबसे अच्छा कल्याणकारी कार्य मनुष्य में ईश्वर चेतना या कृष्ण चेतना जगाना है। इसलिए हर किसी को इस महा आंदोलन की मदद करनी चाहिए। यह श्रीमद्भागवतम के दसवें अध्याय के बाईसवें अध्याय के छत्तीसवें श्लोक में पुष्टि की गई है जिसका उद्धरण आगे चैतन्य चरितामृत में किया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)