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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.9.37 
एकला मालाकार आमि कत फल खाब ।
ना दिया वा एइ फल आर कि करिब ॥37॥
 
 
अनुवाद
"मैं अकेला माली हूँ। अगर मैं ये फल बाँटूँगा नहीं, तो इनका क्या करूँगा? मैं अकेला कितने फल खा सकता हूँ?"
 
"I'm the only gardener. What will I do with them if I don't distribute them? How many fruits can I eat alone?"
तात्पर्य
भगवान चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति के ऐसे अनेक फल उत्पन्न किए कि उन्हें पूरे विश्व में वितरित करना चाहिए; अन्यथा, वह अकेले ही प्रत्येक फल का आनंद कैसे ले सकते थे? भगवान श्री कृष्ण ने श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतार लेने का मूल कारण श्रीमती राधारानी का कृष्ण के प्रेम को समझना और उस प्रेम का स्वाद लेना था। भक्ति के वृक्ष के फल असंख्य थे, और इसलिए वह उन्हें सभी को बिना किसी प्रतिबंध के वितरित करना चाहते थे। श्रील रूप गोस्वामी इसलिए लिखते हैं:

अनर्पित-चारिम चिरत करुनायवतीर्णः कलौ

समर्पयितुमुन्नतो ज्ज्वल-रसां स्व-भक्ति-श्रीयम्

हरिः पुरट-सुन्दर-द्युति-कडम्ब-संदीपितः

सदा हृदय-कन्दरे स्पुरतु वः शची-नन्दनः

परमेश्वर के कई पूर्व अवतार हुए थे, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु की तरह कोई भी उदार, दयालु और महानुभाव नहीं था, क्योंकि उन्होंने भक्ति के सबसे गोपनीय पहलू, अर्थात् राधा और कृष्ण का दाम्पत्य प्रेम वितरित किया था। इसलिए श्री रूप गोस्वामी प्रभुपाद चाहते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु सभी भक्तों के हृदय में सदा निवास करें, जिससे वे श्रीमती राधारानी और कृष्ण के प्रेम संबंधों को समझ सकें और आनंद ले सकें।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)