अनर्पित-चारिम चिरत करुनायवतीर्णः कलौ
समर्पयितुमुन्नतो ज्ज्वल-रसां स्व-भक्ति-श्रीयम्
हरिः पुरट-सुन्दर-द्युति-कडम्ब-संदीपितः
सदा हृदय-कन्दरे स्पुरतु वः शची-नन्दनः
परमेश्वर के कई पूर्व अवतार हुए थे, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु की तरह कोई भी उदार, दयालु और महानुभाव नहीं था, क्योंकि उन्होंने भक्ति के सबसे गोपनीय पहलू, अर्थात् राधा और कृष्ण का दाम्पत्य प्रेम वितरित किया था। इसलिए श्री रूप गोस्वामी प्रभुपाद चाहते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु सभी भक्तों के हृदय में सदा निवास करें, जिससे वे श्रीमती राधारानी और कृष्ण के प्रेम संबंधों को समझ सकें और आनंद ले सकें।
