श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.9.37 
एकला मालाकार आमि कत फल खाब ।
ना दिया वा एइ फल आर कि करिब ॥37॥
 
 
अनुवाद
"मैं अकेला माली हूँ। अगर मैं ये फल बाँटूँगा नहीं, तो इनका क्या करूँगा? मैं अकेला कितने फल खा सकता हूँ?"
 
"I'm the only gardener. What will I do with them if I don't distribute them? How many fruits can I eat alone?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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