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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.9.34 
एकला मालाकार आमि काहाँ काहाँ याब ।
एकला वा कत फल पाड़िया विलाब ॥34॥
 
 
अनुवाद
"मैं अकेला माली हूँ। मैं कितनी जगहों पर जा सकता हूँ? कितने फल तोड़कर बाँट सकता हूँ?"
 
"I'm the only gardener. How many places can I go? How much fruit can I pick and distribute?"
तात्पर्य
यहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु यह संकेत देते हैं कि हरे कृष्ण महामंत्र का वितरण संयुक्त बलों द्वारा किया जाना चाहिए। यद्यपि वे भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, फिर भी वे विलाप करते हैं, "मैं अकेले कैसे कार्य कर सकता हूँ? मैं अकेले ही फल कैसे चुन कर उसे पूरे विश्व में वितरित कर सकता हूँ?" यह इंगित करता है कि समय, स्थान या परिस्थिति की परवाह किए बिना, सभी वर्गों के भक्तों को हरे कृष्ण महामंत्र वितरित करने के लिए एकजुट होना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)