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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  1.9.29 
मागे वा ना मागे केह, पात्र वा अपात्र ।
इहार विचार नाहि जाने, देय मात्र ॥29॥
 
 
अनुवाद
चैतन्य महाप्रभु ने इस बात पर विचार किए बिना कि किसने इसे मांगा और किसने नहीं, और न ही इस बात पर विचार किया कि कौन इसे प्राप्त करने के योग्य है और कौन अयोग्य, उन्होंने भक्ति का फल वितरित किया।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu distributed the fruit of devotion without considering who asks for it, who does not, or who is worthy of receiving it and who is unworthy.
तात्पर्य
यह भगवान चैतन्य के संकीर्तन आंदोलन का सारांश है। संकीर्तन आंदोलन को सुनने या उसमें भाग लेने के लिए उपयुक्त और अनुपयुक्त व्यक्तियों के बीच कोई भेद नहीं किया जाता है। इसलिए इसे बिना किसी भेदभाव के प्रचारित किया जाना चाहिए। संकीर्तन आंदोलन के प्रचारकों का एकमात्र उद्देश्य बिना किसी प्रतिबंध के प्रचार करना चाहिए। यही तरीका है जिस तरह से श्री चैतन्य महाप्रभु ने दुनिया में इस संकीर्तन आंदोलन की शुरुआत की थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)