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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.9.25 
उड़म्बर - वृक्ष येन फले सर्व अङ्गे ।
एइ मत भक्ति - वृक्षे सर्वत्र फल लागे ॥25॥
 
 
अनुवाद
जैसे एक बड़ा अंजीर का पेड़ अपने पूरे शरीर पर फल देता है, वैसे ही भक्ति सेवा के पेड़ का प्रत्येक भाग फल देता है।
 
Just as a huge fig tree bears fruits everywhere, similarly the tree of devotion should bear fruits in every part of it.
तात्पर्य
भक्ति का यह वृक्ष भौतिक जगत का नहीं है। यह आध्यात्मिक जगत में उगता है, जहाँ शरीर के एक अंग और दूसरे अंग में भेद नहीं होता। यह किसी शुगर के पेड़ की तरह है, क्योंकि इस तरह के पेड़ के जिस भी हिस्से को चखा जाए, वह सदैव मीठा होता है। भक्ति के वृक्ष की शाखाएँ, पत्तियाँ और फल सभी भगवान के परम व्यक्तित्व की सेवा के लिए हैं। भक्ति की नौ अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम अर्चनम वंदनं दास्यं सख्यं आत्म-निवेदनम), लेकिन ये सभी केवल भगवान की सेवा के लिए हैं। इसलिए चाहे कोई सुनता हो, जप करता हो, याद करता हो या पूजा करता हो, उसकी क्रियाएं समान परिणाम देंगी। इनमें से कौन सी प्रक्रिया किसी विशेष भक्त के लिए सबसे उपयुक्त होगी यह उसके स्वाद पर निर्भर करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)