ईश्वर पुरी एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे और श्रील माधवेंद्र पुरी के सबसे प्रिय शिष्य थे। श्री चैतन्य-चरितामृत (अंत्य 8.28-31) के अंतिम भाग में कहा गया है:
ईश्वर-पुरी गोसाँई करें श्री-पाद सेवन
स्व-हस्ते करें मल-मूत्रादि मार्जन
निरन्तर कृष्ण-नाम करें स्मरण
कृष्ण-नाम कृष्ण-लीला सुनावें अनुक्षण
तुष्ट हुआँ पुरी ताँरे कैले आलिंगन
वर दिया कृष्णे तोमार हा-उका प्रेम-धन
सेइ हाइते ईश्वर-पुरी प्रेमर सागर
"अपने जीवन के अंतिम चरण में श्री माधवेंद्र पुरी एक अपाहिज हो गए और पूरी तरह से चलने-फिरने में असमर्थ हो गए, और ईश्वर पुरी ने खुद को उनकी सेवा में इतना व्यस्त कर लिया कि उन्होंने स्वयं उनके मल और मूत्र की सफाई की। हमेशा हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करते हुए और अपने जीवन के अंतिम चरण में भगवान कृष्ण के पास्टाइम के बारे में श्री माधवेंद्र पुरी को याद दिलाते हुए, ईश्वर पुरी ने अपने शिष्यों में सर्वश्रेष्ठ सेवा दी। इस प्रकार माधवेंद्र पुरी बहुत प्रसन्न होकर, उन्हें आशीर्वाद दिया, 'मेरे प्यारे लड़के, मैं केवल कृष्ण से प्रार्थना कर सकता हूँ कि वह तुमसे प्रसन्न रहेंगे।' इस प्रकार ईश्वर पुरी अपने आध्यात्मिक गुरु श्री माधवेंद्र पुरी की कृपा से भगवद् प्रेम के सागर में एक महान भक्त बन गए।" श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती अपने गुरु-अष्टक प्रार्थना में कहते हैं, यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादो यस्याप्रसादान न गतिः कुतोऽपि: "आध्यात्मिक गुरु की दया से ही व्यक्ति को कृष्ण की दया प्राप्त होती है। आध्यात्मिक गुरु की कृपा के बिना कोई उन्नति नहीं कर सकता है।" आध्यात्मिक गुरु की दया से ही व्यक्ति पूर्ण होता है, जैसा कि यहाँ विशद रूप से उदाहरण दिया गया है। एक वैष्णव को हमेशा भगवान द्वारा संरक्षित किया जाता है, लेकिन यदि वह एक अपाहिज प्रतीत होता है, तो यह उसके शिष्यों को उसकी सेवा करने का मौका देता है। ईश्वर पुरी ने सेवा से अपने आध्यात्मिक गुरु को प्रसन्न किया, और अपने आध्यात्मिक गुरु के आशीर्वाद से वह इतने महान व्यक्तित्व बन गए कि भगवान चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार किया।
श्रील ईश्वर पुरी श्री चैतन्य महाप्रभु के आध्यात्मिक गुरु थे, लेकिन भगवान चैतन्य को दीक्षा देने से पहले वे नवद्वीप गए और गोपीनाथ आचार्य के घर में कुछ महीने रहे। उस समय भगवान चैतन्य उनके साथ परिचित हुए, और यह समझा जाता है कि उन्होंने अपनी पुस्तक, कृष्ण-लीलामृत का पाठ करके श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा की थी। यह श्री चैतन्य-भागवत, आदि-खंड, अध्याय ग्यारह में बताया गया है।
दूसरों को उदाहरण के द्वारा यह सिखाने के लिए कि अपने आध्यात्मिक गुरु का एक वफादार शिष्य कैसे बनना है, श्री चैतन्य महाप्रभु, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, ईश्वर पुरी के जन्मस्थान कुमार-हट्टा गए और उनके जन्म स्थल से कुछ मिट्टी एकत्र की। उन्होंने इसे बहुत सावधानी से रखा, और वह इसका एक छोटा सा हिस्सा रोज खाते थे। यह चैतन्य-भागवत, आदि-खण्ड, अध्याय सत्रह में कहा गया है। यह अब भक्तों के लिए प्रथा बन गई है कि वे श्री चैतन्य महाप्रभु के उदाहरण का अनुसरण करते हुए वहां जाएं और उस जगह से कुछ मिट्टी एकत्र करें।
