श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.9.10 
जय श्री माधवपुरी कृष्ण - प्रेम - पूर ।
भक्ति - कल्पतरुर तेंहो प्रथम अङ्कुर ॥10॥
 
 
अनुवाद
श्रीमाधवेन्द्र पुरी की जय हो, जो समस्त कृष्ण भक्ति के भण्डार हैं! वे भक्ति के कल्पवृक्ष हैं और उन्हीं में भक्ति का बीज सर्वप्रथम फलित हुआ।
 
All hail Sri Madhavendra Puri, the repository of Krishna devotion! He is the Kalpavriksha (wishful tree) of devotion, and it was in him that the first seed of devotion sprouted.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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