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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.8.7 
एइ सब ना माने येबा करे कृष्ण - भक्ति ।
कृष्ण - कृपा नाहि तारे, नाहि तार गति ॥7॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति पंचतत्त्व की महिमा को स्वीकार नहीं करता, किन्तु फिर भी कृष्ण भक्ति का दिखावा करता है, वह कभी भी कृष्ण की कृपा प्राप्त नहीं कर सकता, न ही परम लक्ष्य तक पहुँच सकता है।
 
One who does not accept the glory of the five elements and yet pretends to be a devotee of Krishna can neither receive the grace of Krishna nor can he advance towards his ultimate goal.
तात्पर्य
यदि कोई कृष्ण चेतना गतिविधियों में गंभीर रूप से रुचि रखता है, तो उसे आचार्यों द्वारा निर्धारित नियमों और विनियमों का पालन करने के लिए तैयार रहना चाहिए, और उसे उनके निष्कर्षों को समझना होगा। शास्त्र कहता है, धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः (महाभारत, वन-पर्व 313.117)। कृष्ण चेतना का रहस्य समझना बहुत कठिन है, लेकिन जो पिछले आचार्यों के निर्देश से आगे बढ़ता है और शिष्य उत्तराधिकार की पंक्ति में अपने पूर्ववर्तियों के पदचिन्हों का अनुसरण करता है उसे सफलता मिलेगी। अन्य नहीं होंगे। इस संबंध में श्रील नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं, चाड़िया वैष्णव-सेवा निस्तार पेयेछे केबा: "जब तक कोई आध्यात्मिक गुरु और आचार्यों की सेवा नहीं करता है, वह मुक्त नहीं हो सकता है।" अन्यत्र वह कहते हैं:

एइ चया गोसाँई याँरा - मुइ ताँरा दास

ताँ-सबारा पद-रेणु मोरा पंच-ग्रास

"मैं केवल उस व्यक्ति को स्वीकार करता हूं जो छह गोस्वामियों के नक्शेकदम पर चलता है, और ऐसे व्यक्ति के चरण-कमलों की धूल मेरा भोजन है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)