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श्लोक 1.8.62  |
वैष्णवेर गुण - ग्राही, ना देखये दोष ।
काय - मनो - वाक्ये करे वैष्णव - सन्तोष ॥62॥ |
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| अनुवाद |
| उन्होंने सदैव वैष्णवों के अच्छे गुणों को स्वीकार किया और उनमें कभी दोष नहीं ढूँढ़े। उन्होंने अपना तन-मन केवल वैष्णवों को संतुष्ट करने में ही लगाया। |
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| He always acknowledged the virtues of Vaishnavas and found no faults in them. He devoted his whole heart and soul to appeasing them. |
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