श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  1.8.62 
वैष्णवेर गुण - ग्राही, ना देखये दोष ।
काय - मनो - वाक्ये करे वैष्णव - सन्तोष ॥62॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने सदैव वैष्णवों के अच्छे गुणों को स्वीकार किया और उनमें कभी दोष नहीं ढूँढ़े। उन्होंने अपना तन-मन केवल वैष्णवों को संतुष्ट करने में ही लगाया।
 
He always acknowledged the virtues of Vaishnavas and found no faults in them. He devoted his whole heart and soul to appeasing them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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