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श्लोक 56
श्लोक
1.8.56
सबार सम्मान - कर्ता, करेन सबार हित ।
कौटिल्य - मात्सर्य - हिंसा ना जाने ताँर चित ॥56॥
अनुवाद
वह सभी का आदर करता था और सबके हित के लिए काम करता था। कूटनीति, ईर्ष्या और जलन उसके हृदय में नहीं थी।
He respected everyone and worked for their welfare. He harbored no trace of diplomacy, jealousy, or malice.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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