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श्लोक 1.8.41  |
नारायणी - चैतन्येर उच्छि ष्ट - भाजन ।
ताँर ग र्भे जन्मिला श्री - दास - वृन्दावन ॥41॥ |
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| अनुवाद |
| नारायणी सदैव चैतन्य महाप्रभु के भोजन के अवशेष खाती हैं। श्रील वृन्दावन दास ठाकुर उनके गर्भ से उत्पन्न हुए। |
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| Narayani always ate the leftovers of Chaitanya Mahaprabhu. Srila Vrindavana Dasa Thakura was born from her womb. |
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