श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.8.40 
वृन्दावन - दास - पदे कोटि नमस्कार ।
ऐछे ग्रन्थ क रि’ तेंहो तारिला संसार ॥40॥
 
 
अनुवाद
मैं वृन्दावन दास ठाकुर के चरणकमलों में कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ। सभी पतित आत्माओं के उद्धार के लिए ऐसा अद्भुत ग्रंथ अन्य कोई नहीं लिख सकता।
 
I offer my obeisances to the lotus feet of Vrindavana Dasa Thakura. No one else could have written such a wonderful text for the salvation of all fallen souls.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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