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श्लोक 1.8.39  |
मनुष्ये रचिते नारे ऐछे ग्रन्थ धन्य ।
वृन्दावन - दास - मुखे वक्ता श्री - चैतन्य ॥39॥ |
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| अनुवाद |
| इस पुस्तक का विषय इतना उदात्त है कि ऐसा प्रतीत होता है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने व्यक्तिगत रूप से श्री वृन्दावन दास ठाकुर के लेखन के माध्यम से बात की है। |
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| The subject matter of this book is so grand that it seems as if Sri Chaitanya Mahaprabhu himself is speaking through the composition of Sri Vrindavan Das Thakur. |
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