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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.8.36 
चैतन्य - निताइर य़ाते जानिये महिमा ।
याते जानि कृष्ण - भक्ति - सिद्धान्तेर सीमा ॥36॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य-मंगल को पढ़कर मनुष्य भगवान चैतन्य और नित्यानंद की समस्त महिमाओं और सत्यों को समझ सकता है और भगवान कृष्ण की भक्ति सेवा के अंतिम निष्कर्ष पर पहुँच सकता है।
 
By reading Sri Chaitanya Mangal, one can understand all the glories or truths of Sri Chaitanya Mahaprabhu and Nityananda Prabhu and can reach the ultimate conclusion of devotion to Lord Krishna.
तात्पर्य
श्रीमद-भागवत एक विशिष्ट संदर्भ पुस्तक है जिससे भक्ति सेवा को समझा जाता है, लेकिन क्योंकि यह बहुत विस्तृत है, कुछ लोग ही इसके उद्देश्य को समझ सकते हैं। श्रीमद-भागवत, वेदांत-सूत्र पर मूल व्याख्या है, जिसे न्याय-प्रस्थान कहा जाता है। यह अचूक तर्क और तर्क के माध्यम से परम सत्य को समझने में सक्षम बनाने हेतु लिखा गया था, और इसलिए इसकी प्राकृतिक टीका, श्रीमद-भागवत, अत्यंत विस्तृत है। व्यावसायिक पाठकों ने यह धारणा बनाई है कि श्रीमद-भागवत केवल कृष्ण की रास-लीला से संबंधित है, यद्यपि कृष्ण की रास-लीला का वर्णन केवल दशम खंड के 29 से 33 अध्यायों में ही किया गया है। इस तरह उन्होंने पश्चिमी दुनिया के लिए कृष्ण को एक महान स्त्री-शिकारी के रूप में प्रस्तुत किया है, और इसलिए प्रचार में हमें कभी-कभी ऐसी भ्रांतियों से जूझना पड़ता है। श्रीमद-भागवत को समझने में एक और कठिनाई यह है कि व्यावसायिक पाठकों ने भागवत-सप्ताह या भगवत के सात दिवसीय वाचन की शुरुआत की है। वे एक सप्ताह में श्रीमद-भागवत को समाप्त करना चाहते हैं, यद्यपि यह इतना श्रेष्ठ है कि श्रीमद-भागवत का एक श्लोक भी, अगर ठीक से समझाया जाए, तो तीन महीने में भी पूरा नहीं किया जा सकता। इन परिस्थितियों में, आम आदमी के लिए श्रील वृंदावन दास ठाकुर के चैतन्य-भागवत को पढ़ना बहुत सहायक है, क्योंकि इस तरह वह वास्तव में भक्ति सेवा, कृष्ण, भगवान चैतन्य और नित्यानंद को समझ सकता है। श्रील रूप गोस्वामी ने कहा है:

श्रुति-स्मृति-पुराणादि- पंचरात्र-विधिं विना

एकान्तिकी हरि भक्तिः उत्पात्या एव कल्पते

"प्रभु के प्रति वह भक्ति सेवा जो अधिकृत वैदिक साहित्यों - उपनिषद, पुराण, नारद-पंचरात्र, आदि - को नज़रअंदाज करती है, समाज में बस एक अनावश्यक गड़बड़ी है।" श्रीमद-भागवत को गलत तरीके से समझने के कारण, लोगों को कृष्ण के विज्ञान के बारे में गुमराह किया जाता है। हालाँकि, श्रील वृंदावन दास ठाकुर की पुस्तक को पढ़ कर कोई भी इस विज्ञान को बहुत ही आसानी से समझ सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)