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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.8.32 
स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु अत्यन्त उदार ।
ताँरे ना भजिले कभु ना हय निस्तार ॥32॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु, स्वतंत्र परम पुरुषोत्तम भगवान्, परम उदार हैं। जब तक कोई उनकी पूजा नहीं करता, उसे कभी मुक्ति नहीं मिल सकती।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu is the independent Supreme Personality of Godhead and is extremely merciful. Without worshipping Him, no one can attain liberation.
तात्पर्य
श्री भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने यहाँ टिप्पणी की है कि राधा-कृष्ण की आराधना को छोड़कर श्री चैतन्य महाप्रभु की आराधना नहीं करनी चाहिए। अकेले राधा-कृष्ण या भगवान चैतन्य की आराधना करने से कोई उन्नति नहीं कर सकता। किसी को भी छह गोस्वामियों के निर्देशों को बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे आचार्य हैं और भगवान चैतन्य को बहुत प्रिय हैं। इसीलिए नरोत्तम दास ठाकुर गाते हैं:

रूप-रघुनाथ-पदे हैबे आकुति

कबे हाँमा बुझाबा से युगल-पिरिती

श्रील रूप गोस्वामी से लेकर रघुनाथ दास गोस्वामी तक सभी छह गोस्वामियों के विनम्र छात्र बनना चाहिए। उनके निर्देशों का पालन न करते हुए, कि कैसे गौरसुन्दर और राधा-कृष्ण की पूजा करें यह कल्पना करना, एक महान अपराध है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति नरक का रास्ता साफ करता है। यदि कोई छह गोस्वामियों के निर्देशों की उपेक्षा करता है और फिर भी राधा-कृष्ण का तथाकथित भक्त बन जाता है, तो वह केवल राधा-कृष्ण के वास्तविक भक्तों की आलोचना करता है। अटकलों के परिणामस्वरूप, वह गौरसुन्दर को एक साधारण भक्त मानता है और इसलिए भगवान राधा-कृष्ण की सर्वोच्च व्यक्तित्व की सेवा करने में प्रगति नहीं कर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)