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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.8.27 
प्रेमेर उदये हय प्रेमेर विकार ।
स्वेद - कम्प - पुलकादि गद्गदाश्रुधार ॥27॥
 
 
अनुवाद
जब किसी की भगवान के प्रति दिव्य प्रेममयी सेवा वास्तव में जागृत होती है, तो यह शरीर में परिवर्तन उत्पन्न करती है जैसे पसीना आना, कांपना, हृदय का धड़कना, आवाज का लड़खड़ाना और आंखों में आंसू आना।
 
When one truly awakens in transcendental loving devotion to the Lord, it produces transformations such as sweating in the body, trembling, palpitations in the heart, difficulty in speaking, and tears in the eyes.
तात्पर्य
ये शारीरिक रूपांतरण भगवान के प्रेम में वास्तव में स्थित होने पर अपने आप प्रकट होते हैं। उन्हें कृत्रिम रूप से नहीं अपनाना चाहिए। हमारी बीमारी भौतिक चीजों की इच्छा है; आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करते हुए भी, हम भौतिक प्रशंसा चाहते हैं। इस बीमारी से मुक्त होना होगा। शुद्ध भक्ति अन्याभिलाषिता-शून्यम होनी चाहिए, बिना किसी भौतिक चीज की इच्छा के। उन्नत भक्त कई शारीरिक परिवर्तन प्रकट करते हैं, जो परमानंद के लक्षण हैं, लेकिन जनता से सस्ती प्रशंसा प्राप्त करने के लिए उनकी नकल नहीं करनी चाहिए। जब कोई वास्तव में उन्नत अवस्था प्राप्त कर लेता है, तो परमानंद के लक्षण स्वतः प्रकट हो जाएंगे; उनकी नकल करने की जरूरत नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)