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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  1.8.26 
‘एक’ कृष्ण - नामे करे सर्व - पाप नाश ।
प्रेमेर कारण भक्ति करेन प्रकाश ॥26॥
 
 
अनुवाद
हरे कृष्ण महामंत्र का केवल बिना किसी अपराध के जप करने से समस्त पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार, भगवान के प्रेम का कारण, शुद्ध भक्ति प्रकट होती है।
 
By simply chanting the Hare Krishna Mahamantra without any guilt, all the sins and deeds are removed and pure devotion as the cause of love for God is manifested.
तात्पर्य
भगवान की भक्ति-सेवा में तब तक आरूढ़ नहीं हुआ जा सकता जब तक कि व्यक्ति पापमय जीवन से मुक्त न हो जाए। भगवद-गीता (7.28) में इसकी पुष्टि की गयी है:

येषां त्वंता-गतं पापं जननां पुण्य-कर्मणां

ते द्वंद्व-मोह-निर्मुक्ता भजन्ते माँ दृढ-व्रताः

"जो व्यक्ति पूर्व-जन्म और इस जीवन में पुण्य कार्य कर चुके हैं और जिनके पापमय कृत्य पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं, वे द्वंद्व और मोह से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय के साथ मेरी सेवा में लिप्त रहते हैं।" एक व्यक्ति जो पापमय जीवन के सभी दूषणों से मुक्त हो चुका है, उद्देश्य की द्वंद्वता या विचलन दिए बिना निःस्वार्थ भाव से भगवान की प्रेममयी आराधना में लीन हो जाता है। इस युग में, हालाँकि लोग बहुत अधिक पापी हैं, फिर भी केवल हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करने से वे अपने पापों के प्रभावों से मुक्त हो सकते हैं। एक कृष्ण-नामे: केवल कृष्ण के नाम का जाप करने से ही यह संभव है। इसकी पुष्टि श्रीमद्-भागवतम (12.3.51) में की गयी है: कीर्तनाद एव कृष्णस्य मुक्त-संगः। चैतन्य महाप्रभु ने भी हमें यही सिखाया है। सड़क से गुजरते समय वे जाप करते थे:

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण हे

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण हे

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण रक्षा माँम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण पाही माँम

राम राघव राम राघव राम राघव रक्षा माँम

कृष्ण केशव कृष्ण केशव कृष्ण केशव पाही माँम

यदि कोई हमेशा कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करता है, तो धीरे-धीरे वह पापमय जीवन के सभी प्रभावों से मुक्त हो जाता है, बशर्ते कि वह अनापत्तिजनक रूप से जाप करे और अधिक पापमय क्रियाकलापों में हरे कृष्ण मन्त्र के जाप के आधार पर शामिल न हो। इस तरह वह पवित्र होता है, और उसकी भक्ति-सेवा ईश्वर के प्रति उसके निष्क्रिय प्रेम को जगाने का कारण बनती है। अगर कोई केवल हरे कृष्ण मंत्र का जाप करता है और पापमय गतिविधियों और अपराधों में शामिल नहीं होता है, तो उसका जीवन पवित्र हो जाता है, और इस तरह वह पूर्णता के पाँचवें चरण पर पहुँच जाता है, या भगवान की प्रेममयी सेवा में व्यस्त रहता है (प्रेमापुम-अर्थोमहान)।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)