श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.8.17 
ज्ञानतः सु - लभा मुक्तिभुक्तिर्यज्ञादि - पुण्यतः ।
सेयं साधन - साहस्त्रैर्हरि - भक्तिः सु - दुर्लभा ॥17॥
 
 
अनुवाद
"दार्शनिक ज्ञान के विकास से मनुष्य अपनी आध्यात्मिक स्थिति को समझ सकता है और इस प्रकार मुक्त हो सकता है, तथा यज्ञ और पुण्य कर्म करके उच्चतर लोकों में इन्द्रियतृप्ति प्राप्त कर सकता है, किन्तु भगवान की भक्ति इतनी दुर्लभ है कि सैकड़ों-हजारों यज्ञ करने पर भी उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता।"
 
"By the study of philosophical knowledge, one can understand one's spiritual state and thus attain liberation; by performing sacrifices and virtuous deeds, one can attain sense gratification in the higher planets, but devotional service to the Lord is so rare that it cannot be attained even by performing thousands of such sacrifices."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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