मतिः न कृष्णे परतः स्वतो वा
मिथोऽभिपद्येत गृह-व्रतानाम्
(भाग. 7.5.30)
नैषाम् मतिः तावद् उरुक्रमाङ्घ्रिम्
स्पृशत्य् अनर्थापगमो यद्-अर्थः
महियासाम् पाद-रजो-अभिषेकम्
निष्कींचनानाम् न वृणीत यावत्
(भाग. 7.5.32)
इन श्लोकों पर चर्चा की जानी चाहिए। उनका आशय यह है कि कोई वैदिक अनुष्ठानों के आधिकारिक निष्पादन से कृष्ण-भक्ति या भगवान की भक्ति सेवा प्राप्त नहीं कर सकता है। हमें एक शुद्ध भक्त के पास जाना होगा। नरोत्तम दास ठाकुर गाते हैं, छ़ाड़िया वैष्णव-सेवा निस्तार पायेचे केबा: "किसे शुद्ध वैष्णव की सेवा किए बिना ऊंचा उठाया गया है?" यह प्रह्लाद महाराज का कथन है कि जब तक कोई शुद्ध वैष्णव के कमल चरणों से धूल स्वीकार करने में सक्षम नहीं हो जाता तब तक भक्ति सेवा के स्तर को प्राप्त करने की कोई संभावना नहीं है। यह रहस्य है। भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.1.36) से उद्धृत उपर्युक्त तंत्र-वचन, इस संबंध में हमारा पूर्ण मार्गदर्शन है।
