इस सब के बावजूद, वे लोग, जो वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन को तर्क और बहस के माध्यम से समझने के लिए जिज्ञासु हैं, उनका स्वागत है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी उन्हें संबोधित करते हैं, "कृपया श्री चैतन्य महाप्रभु की दया को अपनी महत्वपूर्ण परीक्षा में रखें, और यदि आप वास्तव में एक तर्कवादी हैं, तो आप इस सही निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि भगवान चैतन्य से अधिक दयालु कोई भी व्यक्तित्व नहीं है।" तर्कवादियों को अन्य मानवीय कार्यों के सभी परिणामों की तुलना भगवान चैतन्य की दयालु गतिविधियों से करनी चाहिए। यदि उनका निर्णय निष्पक्ष होता है, तो वे समझेंगे कि कोई भी अन्य मानवीय गतिविधियाँ श्री चैतन्य महाप्रभु की गतिविधियों से अधिक नहीं हो सकती हैं।
प्रत्येक व्यक्ति शरीर के आधार पर मानवीय गतिविधियों में संलग्न है, लेकिन भगवद्-गीता (२.१८) से हम समझते हैं, अन्त-वन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः: "भौतिक शरीर अंततः विनाश के अधीन है, जबकि आध्यात्मिक आत्मा शाश्वत है।" श्री चैतन्य महाप्रभु की परोपकारी गतिविधियाँ अनन्त आत्मा के संबंध में की जाती हैं। कोई शरीर को लाभ पहुँचाने की कितनी भी कोशिश करे, यह नष्ट हो जाएगा, और अपने वर्तमान कार्यों के अनुसार उसे दूसरा शरीर स्वीकार करना होगा। यदि वह इसलिए, संक्रमण के इस विज्ञान को नहीं समझता है, लेकिन शरीर को ही सब कुछ मानता है, तो उसकी बुद्धि बहुत अधिक उन्नत नहीं है। शरीर की आवश्यकताओं की उपेक्षा किए बिना, श्री चैतन्य महाप्रभु ने मानवता की अस्तित्व की स्थिति को शुद्ध करने के लिए आध्यात्मिक उन्नति प्रदान की। इसलिए यदि कोई तर्कवादी अपना निर्णय निष्पक्ष रूप से करता है, तो वह निश्चित रूप से यह पाएगा कि श्री चैतन्य महाप्रभु महा-वदान्यावतार, सबसे उदार अवतार हैं। वह स्वयं भगवान कृष्ण से भी अधिक उदार हैं। भगवान कृष्ण ने माँग की कि व्यक्ति उनके सामने समर्पण करे, लेकिन उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु की तरह उदारतापूर्वक भगवद् प्रेम वितरित नहीं किया। इसलिए श्रील रूप गोस्वामी शब्दों के साथ भगवान चैतन्य को अपना सम्मानजनक प्रणाम देते हैं: नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते/ कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नामने गौर-त्विषे नमः। भगवान कृष्ण ने केवल भगवद्-गीता दी, जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति भगवान कृष्ण को समझ सकता है जैसे कि वे हैं, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु, जो स्वयं कृष्ण भी हैं, ने लोगों को बिना किसी भेदभाव के कृष्ण का प्रेम दिया।
