श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 7: भगवान् चैतन्य के पाँच स्वरूप  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.7.85 
पञ्चम पुरुषार्थ - प्रेमानन्दामृत - सिन्धु ।
मोक्षादि आनन्द यार नहे एक बिन्दु ॥85॥
 
 
अनुवाद
'जिस भक्त ने वास्तव में भाव विकसित कर लिया है, उसके लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से प्राप्त सुख समुद्र में बूंद के समान प्रतीत होता है।
 
“To a devotee who has truly developed his devotion, the joy derived from Dharma, Artha, Kama and Moksha seems like a drop in the ocean compared to the ocean.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)