चब्बिश वत्सर छिला गृहस्थ - आश्रमे ।
पञ्च - विंशति वर्षे कैल यति - धर्मे ॥34॥
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु चौबीस वर्षों तक गृहस्थ जीवन में रहे और पच्चीसवें वर्ष में उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया।
Sri Chaitanya Mahaprabhu lived a householder's life for twenty-four years and at the beginning of his twenty-fifth year, he accepted the Sannyasa Ashram.
तात्पर्य
आध्यात्मिक जीवन के चार आश्रम हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास और इन चारों आश्रमों में चार-चार विभाग होते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम के विभाग हैं- सावित्री, प्राजापत्य, ब्रह्म और बृहत्। गृहस्थ आश्रम के विभाग हैं- वृत्ति, संचय, शालीन और शीलोञ्छन। इसी प्रकार वानप्रस्थ आश्रम के विभाग हैं वैखानस, वाल्खिल्य, औडुम्बर और फेनप। संन्यास आश्रम के विभाग हैं कुटीचक, बहूदक, हंस और निष्क्रिय। संन्यासी दो प्रकार के होते हैं, जिन्हें धीर और नर उतम कहा जाता है, जैसा कि श्रीमद् भागवत (1.13.26-27) में कहा गया है। सन् 1432 शकाब्द (सन् 1510 ई.) की जनवरी महीने के अंत में श्री चैतन्य महाप्रभु ने शंकराचार्य सम्प्रदाय के श्री केशव भारती से संन्यास ग्रहण किया था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥